घर में नन्हा मेहमान आया है — नामकरण की तैयारियाँ चल रही हैं। दादी माँ ने पुरानी पीतल की थाली निकाल ली, हल्दी-चावल रखे, और आँगन में खाट पर बैठे पंडित जी से बोलीं — “पंडित जी, नाम तो हमने सोचा हुआ है, पर बताइए तो, किस अक्षर से शुरू करें?” पंडित जी ने बही निकाली, जन्म का समय मिलाया और कहा — “बच्ची अश्विनी नक्षत्र के तीसरे चरण में हुई है। इसका जन्म नाम ‘चो’ अक्षर से बनेगा।”
यही सवाल हज़ारों घरों में उठता है — जन्म नाम क्या होता है, और पंडित जी चरण क्यों गिनते हैं? आज इसे पूरी सारणी के साथ समझते हैं।
जन्म नाम क्या होता है — और चरण क्यों मायने रखता है
बच्चे के जन्म के ठीक समय चंद्रमा जिस नक्षत्र के जिस चरण (पद) में होता है, उसी चरण के अक्षर से नाम शुरू करने की परंपरा है — यही जन्म नाम कहलाता है। चंद्रमा एक राशि से दूसरी राशि में जाने में लगभग ढाई दिन लेता है, पर एक चरण से अगले चरण में पहुँचने में उसे मात्र एक घंटे के आसपास लगता है — इसीलिए जन्म का सही समय इतना मायने रखता है।
और जिस राशि में जन्म के समय चंद्रमा था, वही बच्चे की जन्म राशि या नाम राशि कहलाती है। नाम के पहले अक्षर से बाद में राशि और नक्षत्र भी पहचाने जा सकते हैं — यही कारण है कि पंडित जी चरण को इतनी गंभीरता से लेते हैं।
अगर आप अपने बच्चे का जन्म नक्षत्र जन्म विवरण से निकालना चाहते हैं, तो वहाँ से शुरुआत करें। और नामकरण का मुहूर्त तय करने के लिए शुभ नामकरण तारीखें भी देख लीजिए।
27 नक्षत्रों की चरणाक्षर सारणी (108 पद)
हर नक्षत्र के चार चरण होते हैं और हर चरण का अपना अक्षर है। यही सारणी हज़ारों वर्षों से पंडितों के बही-खातों में चली आ रही है:
- अश्विनी — चु · चे · चो · ला
- भरणी — ली · लू · ले · लो
- कृत्तिका — अ · ई · उ · ए
- रोहिणी — ओ · वा · वी · वु
- मृगशीर्ष — वे · वो · का · की
- आर्द्रा — कु · घ · ङ · छ
- पुनर्वसु — के · को · हा · ही
- पुष्य — हू · हे · हो · डा
- आश्लेषा — डी · डू · डे · डो
- मघा — मा · मी · मू · मे
- पूर्वाफाल्गुनी — मो · टा · टी · टू
- उत्तराफाल्गुनी — टे · टो · पा · पी
- हस्त — पू · ष · ण · ठ
- चित्रा — पे · पो · रा · री
- स्वाति — रू · रे · रो · ता
- विशाखा — ती · तू · ते · तो
- अनुराधा — ना · नी · नू · ने
- ज्येष्ठा — नो · या · यी · यू
- मूल — ये · यो · भा · भी
- पूर्वाषाढ़ा — भू · धा · फा · ढा
- उत्तराषाढ़ा — भे · भो · जा · जी
- श्रवण — खी · खू · खे · खो
- धनिष्ठा — गा · गी · गू · गे
- शतभिषा — गो · सा · सी · सू
- पूर्वाभाद्रपद — से · सो · दा · दी
- उत्तराभाद्रपद — दू · थ · झ · ञ
- रेवती — दे · दो · चा · ची
सारणी के साथ पाँच काम की बातें
1. जन्म का समय अनिश्चित हो तो — उस नक्षत्र के चारों अक्षरों में से कोई भी शुभ माना जाता है। सटीक चरण न पता हो, तो नक्षत्र के चारों अक्षरों में से जो पसंद आए, रख सकते हैं।
2. राशि वाला तरीका — उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में चरण की जगह चंद्र राशि के अक्षरों से नाम रखा जाता है। दोनों ही मान्य परंपराएँ हैं; आपका परिवार जो चलन मानता है, वही ठीक है।
3. क्षेत्रीय अंतर सम्मान के साथ — श्रवण के लिए उत्तर में खी·खू·खे·खो चलता है, दक्षिण की कुछ परंपराओं में जू·जे·जो·घ भी। आर्द्रा के चौथे चरण में छ मुख्य है, कहीं झ भी मिलता है; उत्तराभाद्रपद के चौथे चरण में ञ के साथ ज्ञ का भी प्रचलन है। आपके पंडित जी का पंचांग ही अंतिम अधिकारी है — इंटरनेट की सारणी मार्गदर्शन है, आदेश नहीं।
4. कृत्तिका के स्वर — कुछ बही में अ·ई·उ·ए तो कुछ में आ·ई·ऊ·ए लिखा मिलता है। दोनों ही स्वीकार्य हैं; अक्षर की ध्वनि एक ही परिवार की है।
5. जन्म विवरण से शुभ अक्षर निकालने का आसान रास्ता — अगर बही मिलाना मुश्किल लगे, तो बच्चे की जन्म तारीख, समय और स्थान से पहला अक्षर निकाला जा सकता है, और उसी से उपयुक्त नाम सुझाए जा सकते हैं।
एक ईमानदार बात
जन्म नाम की परंपरा सुंदर है — यह बच्चे को उसकी जन्म-घड़ी से जोड़ती है और घर को एक शुभ शुरुआत का एहसास देती है। पर सच यह भी है कि नाम बच्चे का चरित्र नहीं बनाता — परवरिश, संस्कार और माहौल बनाते हैं। इसे मंगल आरंभ मानिए, किसी परीक्षा का प्रमाणपत्र नहीं। बच्चों के कल्याण के लिए माँ का व्रत जैसी परंपराएँ भी इसी स्नेह का दूसरा रूप हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या हर घर में जन्म नाम रखना ज़रूरी है?
नहीं, यह परंपरा है, नियम नहीं। बहुत से परिवार मनपसंद नाम रखते हैं और साथ में जन्म नाम अलग से दर्ज कर लेते हैं — दोनों का अपना स्थान है।
जन्म समय पता न हो तो क्या करें?
तब नक्षत्र के चारों अक्षरों में से कोई एक चुन लीजिए, या पंडित जी से चंद्र राशि के अनुसार अक्षर निकलवा लीजिए।
क्या नामकरण से पहले अक्षर तय करना चाहिए?
हाँ, यह सबसे व्यवस्थित तरीका है — जन्म के बाद पंडित जी से अक्षर निकलवाइए, फिर उसी से नाम चुनकर शुभ तिथि पर नामकरण संस्कार (परंपरागत रूप से जन्म के 11वें या 12वें दिन) कराइए।
