जनवरी 2027 में मुंडन की तारीखें — संक्षेप में
अगर आप जनवरी 2027 में बच्चे का मुंडन (चूड़ाकर्म) कराने का सोच रहे हैं, तो एक बात पहले साफ कर लें — 1 से 14 जनवरी तक खरमास है। खरमास में मुंडन जैसे संस्कार नहीं होते। 14 जनवरी (गुरुवार) को मकर संक्रांति है, और मुहूर्त की असली शुरुआत 15 जनवरी से होती है। दो स्वतंत्र मुहूर्त स्रोतों — astrodisha.com और ishvaram.com — से सत्यापित इस माह तीन तारीखें निकल रही हैं।
जनवरी 2027 की शुभ तारीखें
तीनों तारीखों पर दोनों स्रोतों के समय और नक्षत्र एक जैसे हैं:
- 15 जनवरी (शुक्रवार): सुबह सूर्योदय से दोपहर 2:13 तक। नक्षत्र रेवती, तिथि शुक्ल सप्तमी। खरमास खुलने के बाद की पहली और सबसे लंबी विंडो।
- 20 जनवरी (बुधवार): सूर्योदय से शाम 4:17 तक। नक्षत्र मृगशिरा, तिथि शुक्ल त्रयोदशी।
- 28 जनवरी (गुरुवार): दोपहर 3:58 से शाम 4:57 तक। नक्षत्र चित्रा, तिथि कृष्ण सप्तमी।
एक नोट: astrodisha.com की सूची में 22 जनवरी (शुक्रवार) भी है — सुबह 9:59 से 11:21 तक की एक छोटी अभिजीत् विंडो। यह तारीख दूसरी सूची में नहीं है, इसलिए इसे केवल पूरक विकल्प मानें। समय दिल्ली के सूर्योदय पर आधारित हैं; अपने शहर के पंचांग के अनुसार अंतिम समय पंडित से जरूर जांच लें और राहु काल से बचें।
अगर जनवरी की ये तारीखें न बन पाएं, तो फरवरी में भी तीन तारीखें दोनों स्रोतों पर एक जैसी हैं: 1 फरवरी (सोमवार, सुबह 8:42 से शाम 4:56), 11 फरवरी (गुरुवार, सुबह 7:07 से शाम 6:04) और 18 फरवरी (गुरुवार, दोपहर 2:29 से शाम 6:09)। पूरी मुंडन मुहूर्त की तारीख-सूची पर आप हर माह की तारीखें देख सकते हैं।
मुंडन मुहूर्त कैसे तय होता है
मुंडन मुहूर्त हवा में नहीं बनता — इसके पीछे मुहूर्त चिंतामणि के चूड़ाकर्म नियम हैं, जिन्हें दोनों स्रोत अपनाते हैं। शुभ नक्षत्र केवल ये हैं: अश्विनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा और रेवती। तिथि शुक्ल या कृष्ण — द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी या त्रयोदशी। वार सोम, बुध, गुरु या शुक्र ही चलते हैं।
एक ईमानदार बात: कुछ कठोर पंचांग (जैसे sanatanshakti.in) लग्न-वर्ण के सख्त नियमों के कारण जनवरी 2027 में कोई तारीख ही नहीं देते — यह गलती नहीं, सिर्फ तरीका अलग है। इसलिए ऊपर की तीन तारीखें मुख्यधारा के दो स्रोतों पर सत्यापित हैं, पर अंतिम फैसला परिवार के पंडित से कराएं। आज का पंचांग देखकर तिथि-नक्षत्र की पुष्टि उसी दिन भी कर सकते हैं।
किस उम्र में मुंडन कराते हैं
मुंडन सोलह संस्कारों में से आठवां संस्कार है, और परंपरा कहती है कि यह बच्चे के विषम वर्ष में हो — पहला, तीसरा, पांचवां या सातवां वर्ष। ज्यादातर परिवार पहला या तीसरा साल चुनते हैं। कुछ पुरानी परंपराओं में जेठे (पहले) बेटे का मुंडन जेठ के महीने में नहीं कराते — यह नियम हर जगह नहीं मानते, पर जानना अच्छा है।
एक नियम जो अक्सर लोग भूल जाते हैं: अगर बच्चे की मां को पांच महीने से ज्यादा का गर्भ है, तो मुंडन निषिद्ध माना गया है (“गर्भिण्यां मातरि शिशोः क्षौर कर्म न कारयेत्”) — हालांकि पांच साल से बड़े बच्चे के लिए यह निषेध नहीं रहता। लड़कियों का मुंडन भी होता है; कई उत्तर भारतीय परंपराओं में लड़के-लड़की दोनों का मुंडन होता है, कुछ समुदायों में लड़कियों का केवल प्रतीकात्मक बाल-काटन। मुहूर्त के नियम दोनों के लिए एक जैसे हैं। नामकरण के बाद मुंडन बच्चे का अगला बड़ा संस्कार है।
विधि में क्या-क्या होता है
मुंडन में गर्भ से मिले बाल पूरी तरह उतारे जाते हैं — मान्यता है कि इससे बच्चे को जन्म के मलिन दोषों से मुक्ति मिलती है और बौद्धिक विकास पर अच्छा असर पड़ता है। सिर के बीचों-बीच शिखा (चोटी) रखी जाती है। पुराने ग्रंथों के अनुसार बाल कटने के बाद सिर पर दही, शहद और मक्खन का लेप लगाया जाता है ताकि ठंडक मिले, फिर स्नान कराया जाता है। कटे हुए बाल किसी धार्मिक स्थल या नदी में छोड़ने की परंपरा है।
तैयारी की बात करें तो नाई की पहले से बात कर लें, बच्चे को खिलाकर और आराम कराकर लाएं, और एक छोटा थाली-सामान रखें — पीतल का लोटा, गंगाजल, दही-शहद, नया कपड़ा। बच्चे के शुभ नाम-अक्षर अभी तक नहीं निकाले हैं तो मुंडन के आसपास का समय इसके लिए अच्छा माना जाता है।
इन बातों का ध्यान रखें
सबसे बड़ी गलती होती है — कैलेंडर की तारीख देखकर काम शुरू कर देना। मुंडन के दिन राहु काल का समय जरूर टालें। दूसरी बात, चंद्र शुद्धि: मुंडन के समय चंद्रमा बच्चे की जन्म राशि से चौथे, आठवें या बारहवें भाव में नहीं होना चाहिए। तीसरी, कई परिवार बच्चे के जन्म नक्षत्र वाले दिन मुंडन कराना शुभ मानते हैं — शर्त यह कि बाकी नियम भी उस दिन पूरे हों।
आखिरी और सबसे जरूरी बात: ये तारीखें शुरुआती सूची हैं, अंतिम आदेश नहीं। हर बच्चे की कुंडली अलग होती है, और पारिवारिक कुल-परंपरा का अपना वजन होता है। तारीख चुनने से पहले अपने पंडित से एक बार जरूर पूछ लें — पांच मिनट की बातचीत सालों के अफसोस से बेहतर है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या बिना मुहूर्त के भी मुंडन हो सकता है?
मान्यता है कि किसी देवस्थल या तीर्थ (जैसे हरिद्वार, वाराणसी, तिरुपति) पर बिना मुहूर्त के कराया गया मुंडन भी शुभ माना जाता है। नवरात्रों में शक्तिपीठों के पास मुंडन की पंजाब-हिमाचल में पुरानी परंपरा भी है।
मुंडन घर पर करें या मंदिर में?
दोनों चलते हैं। घर पर करना हो तो पूजा का स्थान बनाकर परिवार के पुरोहित से कराएं; कई परिवार कुलदेवता के स्थान या तीर्थ पर कराना पसंद करते हैं।
क्या मुंडन के बाद बाल दोबारा मुंडवाने पड़ते हैं?
आमतौर पर एक बार का ही संस्कार है। शिखा रखी रहती है, बाकी बाल सामान्य रूप से बढ़ते हैं — दोबारा मुंडन की कोई शास्त्रीय बाध्यता नहीं है।
