एकादशी क्या है — और यह व्रत इतना खास क्यों है
भोर होने से पहले ही घर में हलचल शुरू हो जाती है। रसोई में आज चूल्हा नहीं जलेगा — दाल-चावल की हांडी अलमारी में ही रहेगी। दादी तुलसी के गमले के पास दीया जलाते हुए कहती हैं — “आज एकादशी है, बेटा। अन्न को हाथ नहीं लगाना।” और घर के हर सदस्य को पता होता है कि आज का दिन कुछ अलग है — आज का दिन भगवान श्री विष्णु जी का है।
एकादशी हर महीने दो बार आती है — शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि और कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि। यानी साल में चौबीस बार। लेकिन 2027 में एक छोटा-सा अपवाद है, जिसके बारे में आगे बताया गया है। इस व्रत की कथा पद्म पुराण में मिलती है: सतयुग में मुर नाम का असुर तीनों लोकों पर हावी हो गया था। जब भगवान श्री विष्णु जी युद्ध के बाद योगनिद्रा में लेटे, तो मुर उन्हें मारने गुफा में घुस आया — तभी भगवान श्री विष्णु जी के शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर का वध कर दिया। भगवान श्री विष्णु जी ने कहा कि चूंकि वे ग्यारहवीं तिथि को प्रकट हुई हैं, उनका नाम एकादशी होगा — और जो भी इस दिन व्रत रखेगा, उसके पाप नष्ट होंगे।
2027 की एकादशी तारीखें — पूरी सूची
नीचे 2027 की सभी एकादशियों की सूची दी गई है। एक बात पर ध्यान दीजिए — इस साल एकादशी 24 नहीं, 25 बार पड़ रही है, क्योंकि सफला एकादशी साल की शुरुआत (3 जनवरी) और अंत (23 दिसंबर) — दोनों बार आ रही है। 2027 में कोई अधिक मास नहीं है, इसलिए इस साल पद्मिनी या परमा एकादशी नहीं होगी। हर महीने की तारीख जानने के लिए आप एकादशी तिथि पृष्ठ भी देख सकते हैं।
- जनवरी: 3 जनवरी (रविवार) — सफला; 18 जनवरी (सोमवार) — पौष पुत्रदा (स्मार्त; वैष्णव 19 जनवरी)
- फरवरी: 2 फरवरी (मंगलवार) — षट्तिला; 17 फरवरी (बुधवार) — जया
- मार्च: 4 मार्च (गुरुवार) — विजया; 18 मार्च (गुरुवार) — आमलकी
- अप्रैल: 2 अप्रैल (शुक्रवार) — पापमोचनी; 17 अप्रैल (शनिवार) — कामदा
- मई: 2 मई (रविवार) — वरुथिनी; 16 मई (रविवार) — मोहिनी
- जून: 1 जून (मंगलवार) — अपरा; 14 जून (सोमवार) — निर्जला (वैष्णव/इस्कॉन 15 जून); 30 जून (बुधवार) — योगिनी
- जुलाई: 14 जुलाई (बुधवार) — देवशयनी; 29 जुलाई (गुरुवार) — कामिका (वैष्णव 30 जुलाई)
- अगस्त: 12 अगस्त (गुरुवार) — श्रावण पुत्रदा; 28 अगस्त (शनिवार) — अजा
- सितंबर: 11 सितंबर (शनिवार) — परिवर्तिनी; 26 सितंबर (रविवार) — इंदिरा
- अक्टूबर: 11 अक्टूबर (सोमवार) — पापांकुशा; 25 अक्टूबर (सोमवार) — रमा (वैष्णव 26 अक्टूबर)
- नवंबर: 10 नवंबर (बुधवार) — देवउठनी; 24 नवंबर (बुधवार) — उत्पन्ना
- दिसंबर: 9 दिसंबर (गुरुवार) — मोक्षदा; 23 दिसंबर (गुरुवार) — सफला
तारीखें दिल्ली के पंचांग के अनुसार हैं। अगर तिथि सूर्योदय के आसपास पड़ रही हो, तो आपके शहर में तारीख एक दिन आगे-पीछे हो सकती है — व्रत से पहले आज का पंचांग देख लेना अच्छा रहता है।
स्मार्त और वैष्णव तारीखें अलग क्यों होती हैं?
कुछ एकादशियों पर आपको दो तारीखें दिखेंगी — यह कोई गलती नहीं है। स्मार्त गृहस्थ और वैष्णव परंपरा में व्रत का दिन चुनने के नियम थोड़े अलग हैं। वैष्णव परंपरा (जिसमें इस्कॉन भी आती है) उस दिन को नहीं मानती, जिस दिन दशमी तिथि सूर्योदय से पहले के समय को छूती है — ऐसे में व्रत अगले दिन रखा जाता है। स्मार्त गृहस्थ आमतौर पर पहला दिन रखते हैं; दूसरा दिन संन्यासियों और मोक्ष चाहने वालों के लिए माना जाता है।
2027 में यह अंतर पांच जगह दिखता है — पौष पुत्रदा (18/19 जनवरी), निर्जला (14/15 जून), कामिका (29/30 जुलाई) और रमा (25/26 अक्टूबर)। विजया के बारे में कुछ जगहों पर 3 मार्च भी लिखा मिलता है, लेकिन द्रिक पंचांग और इस्कॉन कैलेंडर — दोनों ही 4 मार्च कहते हैं; 3 मार्च तिथि शुरू होने का दिन है, व्रत का दिन नहीं। जिस परंपरा को आप मानते हैं, उसी की तारीख रखिए — व्रत शुरू करने के बाद बीच में दिन बदलना, गलत दिन व्रत रखने से ज़्यादा गड़बड़ मानी जाती है।
पारण के नियम — व्रत का सबसे ज़रूरी हिस्सा
बहुत से लोग व्रत तो रख लेते हैं, लेकिन पारण में चूक जाते हैं — और परंपरा कहती है कि पारण ही व्रत को पूरा करता है। पारण एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और द्वादशी खत्म होने से पहले किया जाता है।
एक नियम खास तौर पर याद रखिए — हरि वासर। द्वादशी तिथि का पहला चौथाई हिस्सा हरि वासर कहलाता है, और इस दौरान पारण करना वर्जित माना जाता है। हरि वासर बीतने के बाद, पंचांग में दिए पारण के समय में, पहले तुलसी-जल या चरणामृत लेकर फिर अन्न ग्रहण करके व्रत तोड़ा जाता है। पारण के सही समय के लिए द्वादशी तिथि पृष्ठ देखें।
राजा अम्बरीष की कथा इसका सबसे सुंदर उदाहरण है — पारण का समय बीतने वाला था और अतिथि दुर्वासा ऋषि लौटे नहीं थे, तो राजा ने तुलसी-जल की एक बूंद ग्रहण करके व्रत बचा लिया।
व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
एकादशी पर अन्न पूरी तरह वर्जित है — चावल, गेहूं, जौ, मक्का, बाजरा, सभी दालें और फलियां, सरसों, प्याज-लहसुन और मांसाहार। मान्यता है कि एकादशी के दिन सारे पाप अन्न में आश्रय लेते हैं, इसलिए अन्न से परहेज़ किया जाता है। फलाहार में फल, दूध-दही-घी, मेवे, आलू-शकरकंद जैसी कंद-मूल सब्ज़ियां, सेंधा नमक, कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा का आटा लिया जा सकता है।
व्रत के कई स्तर हैं — निर्जला (बिना अन्न-जल), केवल जल, केवल फल, या एक बार का सात्विक भोजन। व्रत शुरू करने से पहले ही तय कर लीजिए कि आप किस स्तर का व्रत रखेंगे। बच्चे, बहुत बुजुर्ग, गंभीर रूप से बीमार, गर्भवती और दूध पिलाने वाली माताओं के लिए कठोर व्रत की छूट परंपरा में मानी गई है; मधुमेह, निम्न रक्तचाप या गुर्दे की समस्या वाले लोगों को पहले डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
साल की खास एकादशियाँ
निर्जला एकादशी (14 जून) सबसे कठिन और सबसे फलदायी मानी जाती है — मान्यता है कि एक सच्चा निर्जला व्रत साल की बाकी सभी एकादशियों के बराबर फल देता है। इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं, क्योंकि पांडव भीम साल भर में सिर्फ यही एक व्रत रख पाते थे। जून की गर्मी में निर्जला रखना सचमुच कठिन होता है — अगर शरीर साथ न दे, तो जल वाला हल्का व्रत चुनना समझदारी है। ऐसी ही कठोरता छठ पूजा के निर्जला व्रत में भी दिखती है।
देवशयनी एकादशी (14 जुलाई) से चातुर्मास शुरू होता है — मान्यता है कि भगवान श्री विष्णु जी चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, और इस दौरान विवाह जैसे मांगलिक काम रुक जाते हैं। देवउठनी एकादशी (10 नवंबर) पर भगवान श्री विष्णु जी जागते हैं, चातुर्मास खत्म होता है और शुभ काम फिर शुरू हो जाते हैं — उसी दिन तुलसी विवाह भी होता है। पिछले साल की देवउठनी विधि हमने देवउठनी एकादशी 2026 के लेख में विस्तार से बताई थी।
मोक्षदा एकादशी (9 दिसंबर) का दिन दोगुना खास है — उसी दिन गीता जयंती भी पड़ती है, जिस दिन भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। उत्तर भारत में मोक्षदा एकादशी को ही वैकुंठ एकादशी माना जाता है, जबकि दक्षिण के मंदिरों में वैकुंठ एकादशी धनुर्मास के हिसाब से जनवरी 2028 में मनाई जाएगी — यात्रा से पहले तिरुपति देवस्थानम की घोषणा ज़रूर देख लें। गीता के अठारहों अध्याय आप हमारी सनातन शास्त्र लाइब्रेरी में पढ़ सकते हैं। उत्पन्ना एकादशी (24 नवंबर) को एकादशी देवी के प्रकट होने का दिन माना जाता है — यानी यह पहली एकादशी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
एकादशी पर अन्न क्यों नहीं खाना चाहिए?
परंपरा कहती है कि एकादशी के दिन सारे पाप अन्न में वास करते हैं। व्रत का असली मकसद भूखा रहना नहीं, भगवान श्री विष्णु जी के नाम में दिन बिताना है — “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप, कथा और सत्संग।
पहली बार एकादशी व्रत रख रहे हैं — कहां से शुरू करें?
किसी भी आने वाली एकादशी से शुरू कर सकते हैं — मोहिनी (16 मई) या निर्जला (14 जून) जैसे बड़े दिन का इंतज़ार ज़रूरी नहीं। पहले व्रत में फलाहार वाला स्तर चुनिए, पारण का समय पहले से नोट करके रखिए, और व्रत के दिन सुबह स्नान के बाद तुलसी के पास दीया जलाकर संकल्प लीजिए।
