होलाष्टक क्या है?
होली से ठीक आठ दिन पहले एक ऐसा समय शुरू होता है, जब समझदार घरों में कोई शुभ काम हाथ में नहीं लेते। पंडित जी इन दिनों शादी की तारीख देने से मना कर देते हैं, नया कारोबार टल जाता है। इस कालखंड को होलाष्टक कहते हैं — नाम में ही इसका अर्थ छिपा है: होली + अष्टक, यानी होली के आठ दिन।
हिंदू पंचांग के अनुसार होलाष्टक फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से शुरू होकर पूर्णिमा (होलिका दहन) तक रहता है। जैसे छठ पूजा की विधि में हर नियम समय पर निभाया जाता है, वैसे ही होलाष्टक में शुभ कार्यों से परहेज़ की परंपरा है।
होलाष्टक 2027: तारीखें
2027 में होलाष्टक 16 मार्च (मंगलवार) से शुरू होकर 21 मार्च (रविवार) तक रहेगा। सूर्योदय के समय की तिथि के अनुसार 16 मार्च को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी है, इसलिए अधिकांश पंचांग सूचियों में यही तारीख दर्ज है। कुछ कैलेंडरों में 14 मार्च भी दिखता है, पर भक्तिभारत और दैनिक जागरण जैसी प्रमुख सूचियों के साथ खगोलीय गणना भी 16 मार्च को ही अष्टमी बताती है — और होलाष्टक का समापन होलिका दहन के साथ ही होता है। तिथि-गणना से यह अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ तिथियों का कालखंड है; 2027 में ये तिथियाँ 16 से 21 मार्च के बीच पड़ रही हैं।
- 16 मार्च (मंगलवार): फाल्गुन शुक्ल अष्टमी — होलाष्टक आरंभ
- 21 मार्च (रविवार): होलिका दहन (फाल्गुन पूर्णिमा की शाम) — होलाष्टक समापन
- 22 मार्च (सोमवार): रंगों वाली होली (धुलेंडी)
दो पौराणिक कथाएं: प्रह्लाद और कामदेव
होलाष्टक के पीछे दो बड़ी कथाएं प्रचलित हैं। पहली भक्त प्रह्लाद की है — कहा जाता है कि हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति से रोकने के लिए इन्हीं आठ दिनों में भीषण यातनाएं दीं। आठवें दिन होलिका उसे गोद में लेकर आग में बैठी — विष्णु कृपा से प्रह्लाद बच गए, होलिका जल गई। एक भक्त के संघर्ष का समय होने से ही इसे शुभ नहीं माना जाता।
दूसरी कथा कामदेव के भस्म होने की है। देवताओं के कहने पर कामदेव ने भगवान शिव की तपस्या भंग की, तो क्रोधित शिव ने तीसरे नेत्र की अग्नि से उन्हें भस्म कर दिया। मान्यता है कि वह दिन फाल्गुन शुक्ल अष्टमी का ही था। बाद में पत्नी रति की प्रार्थना पर शिव ने कामदेव को पुनर्जीवन का वरदान दिया।
ज्योतिषीय कारण: आठ दिन, आठ उग्र ग्रह
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक के आठों दिनों में ग्रह उग्र स्वभाव में रहते हैं, इसलिए शुभ कार्यों में विघ्न की आशंका मानी जाती है। दिन-वार क्रम यूं है: अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहु उग्र रहते हैं। इसीलिए ज्योतिषी इन आठ दिनों में कोई मांगलिक कार्य हाथ में न लेने की सलाह देते हैं।
होलाष्टक में क्या न करें
परंपरा के अनुसार इन दिनों ये शुभ कार्य टालें:
- विवाह और सगाई — शादी की तारीख होलाष्टक के बाद ही निकालें; विवाह के शुभ मुहूर्त की सूची यहाँ देखें
- गृह प्रवेश — नए घर में प्रवेश होलाष्टक के बाद करें; गृह प्रवेश मुहूर्त पहले से तय कर लें
- मुंडन और नामकरण संस्कार
- नया व्यापार, नई दुकान या नई नौकरी की शुरुआत
- भूमि पूजन और सोलह संस्कारों से जुड़े अन्य मांगलिक कार्य
होलाष्टक के बाद का शुभ समय मुहूर्त हेल्पर से पहले ही तय कर लें।
होलाष्टक में क्या करें
होलाष्टक में पूजा-पाठ पर कोई रोक नहीं है — भजन-कीर्तन, जप और ध्यान इन दिनों विशेष फलदायी माने गए हैं। सिर्फ कामना-सिद्धि के अनुष्ठान और मांगलिक कार्य वर्जित हैं।
इन दिनों विष्णु या शिव के स्तोत्रों का पाठ बढ़ा सकते हैं — सनातन शास्त्र पुस्तकालय में विष्णु सहस्रनाम और शिव स्तोत्र मूल पाठ सहित उपलब्ध हैं। मान्यता है कि इन आठ दिनों में विष्णु सहस्रनाम का पाठ ग्रहों की उग्रता से रक्षा करता है — वैदिक मंत्र संग्रह से अपनी जप-साधना के मंत्र चुनें।
परंपरा के अनुसार होलाष्टक के पहले दिन होलिका दहन का स्थान चुनकर दो डांडे स्थापित किए जाते हैं — होलिका और प्रह्लाद के प्रतीक — और लकड़ियाँ इकट्ठा करना शुरू हो जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या होलाष्टक में पूजा-पाठ कर सकते हैं?
बिल्कुल। पूजा, भजन, जप और ध्यान पर कोई मनाही नहीं — ये शुभ फलदायी माने गए हैं। रोक सिर्फ विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों पर है।
2027 में शादी का मुहूर्त कब निकालें?
होलाष्टक (16–21 मार्च) के बाद का कोई शुभ दिन चुनें — होली 22 मार्च के बाद से तारीखें देखें।
क्या होलाष्टक पूरे भारत में मनाते हैं?
मुख्य रूप से उत्तर भारत — पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश — में प्रचलित है। दक्षिण भारत में इसका उतना प्रचलन नहीं है।
