नवग्रह: नौ, न कम न ज़्यादा
ज्योतिष में जब भी कुंडली की बात आती है, सबसे पहला सवाल यही उठता है — ये ग्रह आखिर हैं कौन? राहु और केतु तो आकाश में दिखते भी नहीं, फिर कुंडली में उनकी इतनी धाक क्यों है? चलिए आज इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढते हैं, बिल्कुल सीधी-सादी भाषा में।
ज्योतिष में ग्रह नौ माने गए हैं — सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु। यहाँ ‘ग्रह’ का अर्थ विज्ञान की किताब वाला planet नहीं — ‘गृह्णाति इति ग्रहः’, जो प्रभाव डाले, वही ग्रह। इसीलिए राहु-केतु भी ग्रह हैं, भले ही वे दिखते न हों। इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है — सूर्य-चंद्रमा के मार्ग के वे दो बिंदु जहाँ ग्रहण लगते हैं।
हफ़्ते के सात दिन, सात ग्रहों के नाम
यह कोई इत्तेफ़ाक नहीं कि रविवार सूर्य का दिन है और सोमवार चंद्रमा का। रविवार = सूर्य, सोमवार = चंद्रमा, मंगलवार = मंगल, बुधवार = बुध, गुरुवार = बृहस्पति, शुक्रवार = शुक्र, शनिवार = शनि — सप्ताह के सातों दिन सात ग्रहों के नाम पर ही हैं। राहु-केतु का अपना दिन नहीं है, पर परंपरा में शनिवार को राहु से और मंगलवार को केतु से जोड़ा जाता है।
नौ ग्रह, नौ स्वभाव
सूर्य (रविवार): आत्मा, पिता और मान-सम्मान के कारक। तांबे के लोटे से सूर्य को जल चढ़ाना इनकी सबसे सरल आराधना मानी जाती है।
चंद्रमा (सोमवार): मन, भावनाएं और माता के कारक। सोमवार को शिवजी की पूजा और मन को शांत रखना चंद्रमा को बल देता है।
मंगल (मंगलवार): ऊर्जा और साहस के कारक। हनुमान चालीसा का पाठ और मसूर की दाल का दान पारंपरिक उपाय हैं — विस्तार से मंगल दोष के उपाय वाले लेख में पढ़ें।
बुध (बुधवार): बुद्धि, वाणी और व्यापार के कारक। बुधवार को हरी मूंग का दान और गणेशजी की पूजा शुभ मानी जाती है।
बृहस्पति (गुरुवार): ज्ञान, धर्म और सौभाग्य के कारक — देवताओं के गुरु। पीले वस्त्र, चने की दाल का दान और केले के पेड़ की पूजा का विधान है।
शुक्र (शुक्रवार): प्रेम, सौंदर्य और भौतिक सुखों के कारक — असुरों के गुरु शुक्राचार्य। लक्ष्मीजी की पूजा और सफ़ेद वस्तुओं का दान परंपरागत है।
शनि (शनिवार): कर्म, अनुशासन और न्याय के कारक। सरसों के तेल का दीपक, काले तिल का दान और हनुमान चालीसा प्रचलित उपाय हैं — साढ़े साती वालों के लिए शनि साढ़े साती के उपाय लेख काम आएगा।
राहु: केवल सिर — शरीर नहीं। इच्छाओं और अचानक बदलावों के कारक। काले तिल-उड़द का दान और दुर्गा उपासना पारंपरिक उपाय माने जाते हैं।
केतु: केवल धड़ — सिर नहीं। वैराग्य और आध्यात्म के कारक। गणेशजी की पूजा और कुत्तों को रोटी खिलाना सरल उपाय माने जाते हैं।
राहु-केतु की कहानी
पुराणों की कथा कहती है कि समुद्र मंथन के अमृत को जब मोहिनी रूप धरे विष्णु देवताओं में बाँट रहे थे, तब स्वर्भानु नाम का असुर देवता का वेश धरकर पंक्ति में बैठ गया। सूर्य-चंद्रमा ने उसे पहचान लिया। अमृत गले से उतरने से पहले ही सुदर्शन चक्र से उसका सिर कट गया — पर अमृत की बूंद काम कर चुकी थी। सिर अमर होकर राहु बना, धड़ केतु। तभी से राहु-केतु सूर्य-चंद्रमा का पीछा करते हैं — जब पकड़ लेते हैं, तो ग्रहण लगता है।
एक आकाश में दो गुरु
नवग्रह स्तोत्र में बृहस्पति को ‘देवानां च ऋषीणां च गुरुं’ कहा गया है — देवताओं और ऋषियों के गुरु; और शुक्र को ‘दैत्यानां परमं गुरुं’ — दैत्यों के परम गुरु। बृहस्पति विस्तार और ज्ञान देते हैं, शुक्र भोग और कला। दोनों अपनी-अपनी जगह शुभ हैं — बस कुंडली में उनकी स्थिति देखनी होती है। मेरी अपनी राय में, ग्रहों को ‘अच्छा-बुरा’ के खानों में बाँटने से ज़्यादा ज़रूरी है यह समझना कि हर ग्रह किसी न किसी काम का है।
अपनी कुंडली में नवग्रह कैसे देखें
सबसे पहला कदम — अपनी फ्री जन्म कुंडली बनवाकर देखिए कौन-सा ग्रह कहाँ बैठा है। ग्रहों की चाल (गोचर) बदलती रहती है, इसलिए उपाय शुरू करने से पहले कुंडली समझना ज़रूरी है। नवग्रह शांति के लिए नवग्रह सूक्तम का पाठ बताया गया है — हमारी सनातन शास्त्र लाइब्रेरी में आप इसे पढ़ सकते हैं। और नवग्रहों के मंत्रों का नियमित जाप सबसे सीधा उपाय है — न कोई खर्च, न आडंबर, बस अनुशासन चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या राहु-केतु सच में ग्रह हैं?
वे छाया ग्रह हैं — कोई ठोस पिंड नहीं, बल्कि सूर्य-चंद्र मार्ग के दो बिंदु जहाँ ग्रहण लगते हैं।
नवग्रह की पूजा एक साथ कैसे करें?
नौ ग्रहों को क्रम से जल-फूल अर्पित किए जाते हैं, साथ में नवग्रह स्तोत्र का पाठ होता है। किसी जानकार पंडित से विधि पूछकर करना बेहतर है।
क्या उपायों से भाग्य बदल जाता है?
उपाय कोई जादू की छड़ी नहीं। जप-दान-व्रत से मन को अनुशासन और सकारात्मकता मिलती है — और शांत मन से लिए गए फ़ैसले अक्सर बेहतर निकलते हैं। चमत्कार का वादा करने वालों से दूरी रखें।
