बिहार के किसी घाट पर खड़े होकर देखिए: हज़ारों लोग कमर तक पानी में उतरे हैं, हाथों में बांस की टोकरी थामे, डूबते सूरज की ओर अर्घ्य बढ़ा रहे हैं। मन में एक ही सवाल उठता है — सूरज तो हर दिन उगता-डूबता है, फिर उसके लिए चार दिन का इतना कठिन व्रत क्यों? जवाब एक कहानी में नहीं, कई कहानियों और एक बहुत पुरानी श्रद्धा में छिपा है।
छठ में पूजा किनकी होती है?
छठ में पूजा किनकी होती है — इसका जवाब ही पर्व की आत्मा है। दो की आराधना होती है: सूर्यदेव और छठी मइया। सूर्यदेव हमारे प्रत्यक्ष देवता हैं — न मूर्ति में बंधे, न तस्वीर में; वे हर सुबह खुद आंखों के सामने आते हैं। लोकमान्यता के अनुसार छठी मइया सूर्यदेव की बहन हैं, जिन्हें बच्चों की रक्षिका कहा गया है — इसलिए यह व्रत ज़्यादातर संतान के सुख और लंबी उम्र के लिए रखा जाता है।
मान्यता यह भी है कि सूर्य की शक्तियां उनकी पत्नियों — उषा (सुबह की पहली किरण) और प्रत्यूषा (शाम की अंतिम किरण) — में बसती हैं। इसलिए छठ में उगते के साथ डूबते सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है: सुबह उषा को नमन, शाम प्रत्यूषा को।
क्यों मनाई जाती है छठ — पौराणिक कथाएं
राम-सीता की कथा: मान्यता है कि लंका विजय के बाद अयोध्या लौटकर श्रीराम और माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को व्रत रखा और सूर्यदेव की उपासना की; सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर आशीर्वाद मांगा। यही परंपरा छठ पर्व के रूप में आगे बढ़ी।
द्रौपदी की कथा: महाभारत काल में जब पांडव जुए में राजपाट हार गए, तो श्रीकृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा। मान्यता है कि सूर्यदेव की कृपा से पांडवों को खोया राजपाट वापस मिला।
कर्ण की कथा: सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण सूर्यदेव के परम भक्त थे — रोज़ घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे, और उनकी कृपा से ही महान योद्धा बने। कहा जाता है कि उन्होंने ही सबसे पहले सूर्य की इस विधि से पूजा शुरू की थी; आज भी छठ में अर्घ्य की वही पद्धति चली आ रही है। देवमाता अदिति ने भी छठी मइया की आराधना से तेजस्वी पुत्र (आदित्य) का वरदान पाया था।
चार दिनों का महापर्व — छठ 2026 की तारीखें
छठ कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से सप्तमी तक मनाया जाता है। 2026 की तारीखें:
- नहाय-खाय — शुक्रवार, 13 नवंबर 2026: पवित्र स्नान और सात्विक भोजन; घर की सफाई के बाद व्रत का संकल्प।
- खरना — शनिवार, 14 नवंबर 2026: दिन भर निर्जला उपवास; शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद, जिसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत।
- संध्या अर्घ्य — रविवार, 15 नवंबर 2026: डूबते सूर्य को अर्घ्य; व्रती निर्जल रहते हुए सूर्यास्त तक घाट पर पूजा करते हैं।
- उषा अर्घ्य — सोमवार, 16 नवंबर 2026: उगते सूर्य को अर्घ्य और व्रत का पारण।
पूरे अनुष्ठान में पवित्रता के कड़े नियम निभाए जाते हैं — लहसुन-प्याज़ वर्जित, प्रसाद मिट्टी के चूल्हे और आम की लकड़ी पर बनता है। चार-दिवसीय पूजा विधि की विस्तृत जानकारी हमारे विधि-विशेष लेख में है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य — इस पर्व की सबसे खास बात
छठ की सबसे गहरी सीख संध्या अर्घ्य में है। उगते सूरज को सलाम करना आसान है — सफलता और नई शुरुआत की पूजा। लेकिन छठ कहता है: जो ढल रहा है, वह भी उतना ही पूजनीय है। डूबता सूर्य याद दिलाता है कि सुख-दुख जीवन के चक्र हैं; जिसका आज अस्त हुआ है, उसका कल उदय निश्चित है। इसलिए इसे महाव्रत कहते हैं — यह केवल उपवास नहीं, जीवन के उतार-चढ़ाव को स्वीकार करने की साधना है।
यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का उत्सव भी है — सूर्य, जल, वायु और अन्न के प्रति आभार। घाटों पर जाति-पात के भेद मिट जाते हैं; समाज का हर वर्ग एक साथ सफाई और पूजा में जुटता है। त्योहारों का वार्षिक चक्र हिंदू कैलेंडर में देखें; सूर्य उपासना के मंत्र वैदिक मंत्र संग्रह में मिलेंगे, और सूर्य-सूक्त जैसे ग्रंथ हमारे सनातन शास्त्र पुस्तकालय में पढ़े जा सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या कोई भी व्यक्ति छठ का व्रत रख सकता है?
हां — कोई भी महिला या पुरुष श्रद्धा और शुद्धता के साथ रख सकता है; जाति-वर्ग का कोई बंधन नहीं। लेकिन एक बार शुरू करने के बाद हर साल नियमपूर्वक निभाना माना जाता है, जब तक अगली पीढ़ी को जिम्मेदारी न सौंप दी जाए।
छठी मइया कौन हैं?
लोकमान्यता के अनुसार वे सूर्यदेव की बहन और बच्चों की रक्षिका देवी हैं — संतान के सुख की कामना से उन्हीं की आराधना इस व्रत का केंद्र है।
सूर्य को जल क्यों चढ़ाया जाता है?
सूर्य जीवन, ऊर्जा और प्रकाश के स्रोत हैं — अन्न और समृद्धि के दाता। जल अर्पित करना उनके प्रति आभार की प्राचीन विधि है; माना जाता है कि कर्ण से चली आई यही पद्धति आज भी घाटों पर दोहराई जाती है।
