दीवाली के दो हफ्ते बाद एक और दीवाली — देवताओं वाली
दीवाली की रात को मुश्किल से पंद्रह दिन बीतेंगे कि काशी एक बार फिर जगमगा उठेगी। 24 नवंबर 2026, मंगलवार को कार्तिक पूर्णिमा है — वही रात जिसे देव दीवाली या देव दीपावली कहा जाता है। कहते हैं, इस रात देवता खुद गंगा में स्नान करने धरती पर उतरते हैं, और वाराणसी के 84 घाट उन्हें दीयों की कतारों से स्वागत करते हैं।
यह लेख आपको तारीख, कथा और पूरी पूजा विधि सरल भाषा में देगा — चाहे आप काशी जा रहे हों या घर पर ही यह पर्व मनाना चाहते हों।
कार्तिक पूर्णिमा 2026 — तारीख और शुभ समय
- तारीख: मंगलवार, 24 नवंबर 2026
- पूर्णिमा तिथि: सोमवार 23 नवंबर रात ~11:42 बजे से मंगलवार 24 नवंबर रात ~8:23 बजे तक
- दीपदान का सबसे शुभ समय: शाम का प्रदोष काल — वाराणसी के लिए ~5:09 से 7:54 बजे (शहर के अनुसार थोड़ा बदल सकता है, इसलिए आज का पंचांग में अपने शहर का समय ज़रूर देख लें)
कार्तिक मास में आने वाली यह पूर्णिमा साल भर की पूर्णिमाओं में सबसे अधिक पुण्यदायी मानी जाती है। मान्यता है कि इस महीने विष्णु भगवान की विशेष कृपा रहती है, और पूरे मास चलने वाला कार्तिक स्नान इसी दिन संपन्न होता है। जो लोग कार्तिक भर रोज़ गंगा स्नान नहीं कर पाते, उनके लिए इस एक दिन का स्नान-दान उतना ही फल देने वाला माना जाता है।
देव दीवाली की कथा — जब शिव बने त्रिपुरारी
देव दीवाली की जड़ें त्रिपुरासुर की कथा में हैं। त्रिपुरासुर ने ब्रह्मा से ऐसा वरदान पाया था कि उसे तीन उड़ती हुई नगरियों — त्रिपुरा — के साथ लगभग अमरता मिल गई। तीनों लोकों में उसने आतंक मचा दिया और देवता भी उसके सामने हार गए। तब देवताओं ने भगवान शिव से सहायता मांगी।
कार्तिक पूर्णिमा के दिन शिव ने त्रिपुरारी का रूप धरा और तीनों नगरियों को एक ही बाण से भस्म कर दिया। कहा जाता है कि विजय के उस क्षण देवताओं ने दीप जलाकर प्रसन्नता मनाई — और तभी से इस रात को देवताओं की दीवाली कहा जाता है। इसीलिए इस दिन को त्रिपुरी या त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। आप सनातन शास्त्र लाइब्रेरी में शिव से जुड़े स्तोत्र और कथाएँ पढ़ सकते हैं।
वाराणसी में क्या होता है उस रात
वाराणसी में देव दीवाली सिर्फ एक त्योहार नहीं, एक अनुभव है। शाम ढलते ही घाटों पर दीये जलने शुरू होते हैं और कुछ घंटों में पूरी नदी दीयों की नदी जैसी लगने लगती है। परंपरा के अनुसार उस रात देवता गंगा में स्नान करने आते हैं — इसलिए सुबह से ही घाटों पर कार्तिक स्नान के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। शाम को गंगा आरती होती है और घरों में भी दीप जलाए जाते हैं, ठीक दीपावली 2026 की तरह।
नदी के किनारे होने वाला एक और बड़ा पर्व छठ पूजा भी है — उसके बाद देव दीवाली, कार्तिक मास की रोशनी का अंतिम भव्य उत्सव मानी जाती है।
कार्तिक पूर्णिमा की पूजा विधि
- सुबह का स्नान: भोर में गंगा या किसी पवित्र नदी में डुबकी लगाएँ। नदी न पहुँच सकें तो घर के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान के बाद सूर्य को जल अर्पित करें।
- संकल्प: व्रत का संकल्प लें और दिन भर सात्विक भोजन रखें।
- शिव पूजा: “ॐ नमः शिवाय” का जाप करते हुए शिवलिंग पर जल या दूध से अभिषेक करें। साथ में पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और नंदी की पूजा करें।
- विष्णु पूजा: कार्तिक विष्णु का मास है — भगवान विष्णु का पंचामृत से अभिषेक करें, फूल और भोग अर्पित करें।
- शाम को सत्यनारायण कथा: संध्या समय सत्यनारायण भगवान की कथा करना इस दिन विशेष फलदायी माना जाता है। भगवान को खीर का भोग लगाएँ।
- दीपदान: दीवाली की ही तरह शाम को दीप जलाएँ — घर के दरवाज़े, तुलसी के पास और हो सके तो बहती नदी में दीया प्रवाहित करें। यही इस पर्व का सबसे सुंदर और सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान है।
- दान: मान्यता है कि इस दिन तिल, अन्न, वस्त्र और दीप का दान विशेष पुण्य देता है। ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करें।
मुहूर्त के लिए पूर्णिमा की तारीखें वाला पेज साल भर की पूर्णिमाओं की सूची देता है, और आरतियों का संग्रह में गंगा आरती सहित सभी प्रमुख आरतियाँ मिल जाएँगी।
क्या करें, क्या न करें
- करें: चंद्रमा के दर्शन करें — पूर्णिमा का चाँद इस रात की सबसे बड़ी विभूति है। दिन भर शांत मन रखें और बुज़ुर्गों का आशीर्वाद लें।
- न करें: कार्तिक मास में पारंपरिक रूप से तामसिक भोजन (मांस, शराब) से परहेज़ किया जाता है; इस पवित्र दिन तो बिल्कुल नहीं। किसी से छल-कपट या कठोर वचन बोलना भी वर्जित माना जाता है।
एक बात अपनी ओर से: अगर आप वाराणसी नहीं जा पा रहे, तो निराश होने की ज़रूरत नहीं। घर की छत पर जलाया गया एक दीया भी उसी भावना का हिस्सा है जिससे काशी के घाट जगमगाते हैं — भावना ही इस पर्व की असली आग है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या घर पर भी देव दीवाली मनाई जा सकती है?
बिल्कुल। शाम को घर के मुख्य द्वार, आँगन और तुलसी के पास दीये जलाएँ, गंगा आरती पढ़ें और दीपदान के रूप में किसी बहते पानी या तुलसी के पास दीया रखें।
दीवाली और देव दीवाली में क्या अंतर है?
दीवाली अमावस्या को मनाई जाती है — यह इंसानों का पर्व है। देव दीवाली पूर्णिमा को होती है, दीवाली के लगभग पंद्रह दिन बाद — यह देवताओं का पर्व मानी जाती है, और इसका केंद्र वाराणसी के घाट हैं।
क्या इसी दिन गुरु नानक जयंती भी होती है?
हाँ। 2026 में कार्तिक पूर्णिमा को ही सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी की जयंती (गुरु पर्व) भी पड़ रही है। इस दिन गुरुद्वारों में विशेष कीर्तन और गुरु वाणी का पाठ होता है।
